बिहार बदल रहा है। लेकिन क्या बिहार का हर हिस्सा बदल रहा है?
पटना की चौड़ी होती सड़कें, नए पुल, बढ़ते बाजार और तेजी से बदलता शहरी जीवन बिहार की एक तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन इसी बिहार से कुछ सौ किलोमीटर दूर जाएं तो तस्वीर बदल जाती है। कहीं बाढ़ के बाद खेतों पर संकट है, कहीं रोजगार के लिए युवाओं का पलायन मजबूरी है, कहीं अस्पताल तक पहुंचना चुनौती है और कहीं स्कूल होने के बावजूद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब भी सपना है।
यही विरोधाभास बिहार की गरीबी को समझने की सबसे बड़ी कुंजी है।
सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 2026 में बिहार की गरीबी का कोई नया पूर्ण राष्ट्रीय MPI सर्वेक्षण उपलब्ध नहीं है। इसलिए वर्तमान स्थिति समझने के लिए नवीनतम उपलब्ध NITI Aayog के आंकड़ों, 2026-27 के बिहार बजट और सरकारी योजनाओं के आंकड़ों को साथ देखकर तस्वीर बनानी होगी।
बिहार में गरीबी कितनी है?
NITI Aayog के National Multidimensional Poverty Index के अनुसार 2015-16 में बिहार की 51.89% आबादी बहुआयामी गरीबी में थी। 2019-21 में यह घटकर 33.76% रह गई।
यानी लगभग पांच वर्षों में 18 प्रतिशत अंक से ज्यादा की गिरावट आई।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है।
लेकिन समस्या यह है कि इसी अवधि में भारत का बहुआयामी गरीबी अनुपात बिहार से काफी नीचे था। NITI Aayog के बाद के अनुमान में 2022-23 के लिए बिहार का MPI headcount ratio लगभग 26.59% आंका गया, जबकि भारत का अनुमानित स्तर लगभग 11.28% था।
बिहार में गरीबी कम हो रही है, लेकिन बिहार अभी भी राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है।
और ग्रामीण बिहार में स्थिति और गंभीर रही है।
2019-21 में बिहार की ग्रामीण बहुआयामी गरीबी 36.95% थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 16.67% थी।
यानी बिहार की गरीबी की सबसे बड़ी लड़ाई गांवों में लड़ी जानी है।
गरीबी सिर्फ पैसे की कमी नहीं
गरीबी को सिर्फ यह पूछकर नहीं समझा जा सकता कि किसी व्यक्ति की मासिक आय कितनी है।
NITI Aayog का MPI स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर से जुड़े कई संकेतकों को देखता है।
बिहार के मामले में पोषण, स्कूली शिक्षा, मातृ स्वास्थ्य, स्कूल में उपस्थिति, खाना पकाने का ईंधन और स्वच्छता जैसे क्षेत्र गरीबी की तस्वीर को प्रभावित करते हैं। 2019-21 के बिहार MPI में पोषण का योगदान लगभग 27.95%, वर्षों की स्कूली शिक्षा का 18.32% और मातृ स्वास्थ्य का 13.11% था।
इसलिए अगर बिहार को वास्तव में गरीबी से बाहर निकालना है तो केवल लोगों को आर्थिक सहायता देना पर्याप्त नहीं होगा।
बच्चे स्वस्थ हों, स्कूल में टिकें, युवाओं को कौशल मिले, महिलाओं को रोजगार मिले और परिवार की आय स्थायी रूप से बढ़े तभी गरीबी की जड़ कमजोर होगी।
आंकड़ों के पीछे का बिहार
अब सवाल है कि इन आंकड़ों के पीछे वास्तविक बिहार कैसा दिखता है?
बिहार का पिछड़ा इलाका कोई एक जिला नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी अलग समस्याएं हैं।
सीमांचल की चुनौती
अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार जैसे सीमांचल के इलाकों में विकास की चुनौती को सिर्फ गरीबी के आंकड़े से नहीं समझा जा सकता।
यहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि पर निर्भरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोजगार के अवसरों को एक साथ देखना पड़ता है।
कई परिवारों के लिए खेती और दिहाड़ी आज भी आय के प्रमुख साधन हैं। जब स्थानीय स्तर पर पर्याप्त गैर-कृषि रोजगार नहीं बनता तो युवा बाहर जाने को मजबूर होते हैं।
कोसी की अलग कहानी
कोसी क्षेत्र में विकास की चुनौती में बाढ़ और जलप्रबंधन का सवाल भी जुड़ जाता है।
हर साल बाढ़ का खतरा केवल घरों तक सीमित नहीं रहता। खेत, सड़क, पशुधन, स्थानीय बाजार और छोटे कारोबार प्रभावित होते हैं।
ऐसे इलाके में गरीबी से बाहर निकलने वाला परिवार अगर एक प्राकृतिक आपदा में अपनी फसल या घर खो देता है तो वह फिर आर्थिक संकट में लौट सकता है।
इसलिए बिहार में गरीबी उन्मूलन का मतलब आपदा-रोधी विकास भी है।
दक्षिण बिहार की चुनौती
गया, जमुई, बांका और आसपास के कई ग्रामीण क्षेत्रों में समस्या का स्वरूप अलग है।
यहां रोजगार, सिंचाई, कृषि उत्पादकता, छोटे उद्योग और बाजार से बेहतर जुड़ाव जैसी चुनौतियां महत्वपूर्ण हैं।
यानी बिहार के हर पिछड़े क्षेत्र के लिए एक जैसा विकास मॉडल काम नहीं करेगा।
सीमांचल को अलग रणनीति चाहिए, कोसी को अलग और दक्षिण बिहार के सूखा/कम सिंचाई वाले क्षेत्रों को अलग।
बिहार की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, फिर भी सवाल क्यों?
बिहार की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को देखकर तस्वीर सकारात्मक लगती है।
लेकिन किसी राज्य के विकास को केवल GSDP की वृद्धि से नहीं मापा जा सकता।
अगर राज्य की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है लेकिन प्रति व्यक्ति आय कम है, तो सवाल उठता है कि उस आर्थिक वृद्धि का लाभ आम परिवार तक कितनी तेजी से पहुंच रहा है।
यही बिहार की सबसे बड़ी चुनौती है
Growth हो रही है, लेकिन उसे ज्यादा व्यापक और ज्यादा रोजगार पैदा करने वाला Growth बनाना होगा।
बिहार को ऐसे उद्योग चाहिए जो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दें।
कृषि को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसान केवल कच्चा उत्पाद बेचने के बजाय processing और value addition से अधिक कमाई कर सके।
युवाओं को केवल डिग्री नहीं, market-oriented skills चाहिए।
और महिलाओं को केवल स्वयं सहायता समूह से जोड़ना पर्याप्त नहीं; उनके उत्पादों को बाजार और उनके श्रम को बेहतर आय से जोड़ना भी जरूरी है।
सरकारों की योजनाएं: क्या किया जा रहा है?
गरीबी कम करने के लिए केंद्र और बिहार सरकार दोनों की कई योजनाएं काम कर रही हैं।
प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के जरिए गरीब परिवारों को पक्के घर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
इसके अलावा मनरेगा, PM-KISAN, खाद्य सुरक्षा, उज्ज्वला, जल जीवन मिशन, स्वच्छ भारत, आयुष्मान भारत, जनधन और कौशल विकास जैसी योजनाएं गरीबी के अलग-अलग पहलुओं को संबोधित करती हैं।
राज्य स्तर पर JEEViKA ने ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों और आजीविका गतिविधियों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सतत जीविकोपार्जन योजना जैसे कार्यक्रम अत्यंत गरीब परिवारों को आय के स्थायी साधन उपलब्ध कराने की दिशा में काम करते हैं।
लेकिन किसी योजना की सफलता केवल यह नहीं है कि कितने लाभार्थियों को लाभ मिला।
असली सवाल है
क्या उस परिवार की आय स्थायी रूप से बढ़ी?
2026-27 का बिहार बजट क्या कहता है?
बिहार ने 2026-27 में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सामाजिक क्षेत्रों पर बड़ा खर्च प्रस्तावित किया है।
बजट विश्लेषण के अनुसार राज्य ने कुल व्यय का लगभग 21.7% शिक्षा, 6.3% स्वास्थ्य और 9.4% ग्रामीण विकास के लिए रखा है।
शिक्षा पर खर्च राज्यों के 2025-26 के औसत आवंटन से काफी अधिक है। ग्रामीण विकास का आवंटन भी दूसरे राज्यों के औसत से ज्यादा है।
लेकिन एक दिलचस्प बात भी सामने आती है।
बिहार ने कृषि पर लगभग 2.6% खर्च का प्रावधान किया है, जो राज्यों के 2025-26 के औसत लगभग 5.7% से कम है।
यह सवाल महत्वपूर्ण है क्योंकि बिहार की बड़ी ग्रामीण आबादी सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है।
अगर बिहार की ग्रामीण गरीबी कम करनी है तो कृषि, सिंचाई, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण और बाजार को विकास के केंद्र में रखना होगा।
असली समस्या: रोजगार
गरीबी से निकलने का सबसे टिकाऊ रास्ता रोजगार है।
सरकारी सहायता गरीब परिवार को संकट से बचा सकती है, लेकिन स्थायी रोजगार परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकता है।
यही कारण है कि बिहार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है
युवाओं के लिए स्थानीय और उत्पादक रोजगार तैयार करना।
आज बिहार का युवा अक्सर नौकरी के लिए दूसरे राज्यों की ओर देखता है।
यह पलायन हमेशा बुरी चीज नहीं है। देश के भीतर श्रमिकों का आर्थिक अवसरों का हिस्सा है।
लेकिन समस्या तब है जब किसी युवा के पास अपने ही राज्य में पर्याप्त अवसर उपलब्ध न हों और पलायन उसकी मजबूरी बन जाए।
बिहार को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जहां युवा कह सके
“बाहर जाना विकल्प है, मजबूरी नहीं।”
बिहार को देश से पीछे क्या रख रहा है?
बिहार की समस्या केवल गरीबी नहीं है।
यह कई समस्याओं का एक चक्र है
कम आय → कम निवेश → कमजोर मानव पूंजी → कम उत्पादकता → कम गुणवत्तापूर्ण रोजगार → पलायन → स्थानीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी।
इस चक्र को तोड़ना होगा।
इसके लिए बिहार को पांच क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा:
पहला—गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
दूसरा—स्वास्थ्य और पोषण।
तीसरा—बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करने वाले उद्योग।
चौथा—कृषि से जुड़ी value chain।
पांचवां—पिछड़े क्षेत्रों के लिए district-specific development model।
बिहार के लोगों के लिए यह शर्म नहीं, चेतावनी है
गरीब होना किसी व्यक्ति या समाज के लिए शर्म की बात नहीं है।
बिहार का मजदूर जो पंजाब में काम करता है, किसान जो सीमित जमीन पर खेती करता है, छात्र जो कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करता है—इनकी मेहनत बिहार की ताकत है।
इसलिए सवाल गरीब परिवारों से नहीं पूछा जाना चाहिए।
सवाल व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए
क्या बिहार ने अपने लोगों के लिए पर्याप्त अवसर बनाए हैं?
अगर किसी युवा को रोजगार के लिए हजार किलोमीटर दूर जाना पड़ता है, अगर किसी किसान की आय प्राकृतिक आपदा से बार-बार टूट जाती है, अगर किसी ग्रामीण परिवार को बेहतर इलाज के लिए बड़े शहर जाना पड़ता है और अगर बच्चों को अच्छी शिक्षा के लिए गांव से बाहर जाना पड़ता है, तो यह केवल व्यक्ति की समस्या नहीं है।
यह विकास की गुणवत्ता का सवाल है।
बिहार को अब सिर्फ विकास नहीं, समान विकास चाहिए
बिहार ने गरीबी कम करने में उल्लेखनीय प्रगति की है। 2015-16 की 51.89% बहुआयामी गरीबी से 2019-21 में 33.76% तक आना इसका प्रमाण है।
लेकिन राष्ट्रीय औसत से बड़ा अंतर अभी भी मौजूद है।
इसलिए बिहार के सामने अगला लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि गरीबी का प्रतिशत कम हो।
लक्ष्य होना चाहिए—
हर जिले में रोजगार।
हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
हर परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा।
हर किसान को बेहतर बाजार।
हर महिला को आर्थिक अवसर।
और हर युवा को अपने राज्य में सम्मानजनक काम का विकल्प।
बिहार को देश से पीछे बताने वाले आंकड़े मौजूद हैं, लेकिन यही आंकड़े यह भी बताते हैं कि बदलाव संभव है।
अब जरूरत है उस बदलाव को पटना से निकलकर गांवों तक, विकसित जिलों से निकलकर पिछड़े इलाकों तक और बजट की घोषणाओं से निकलकर आम परिवार की आय तक पहुंचाने की।
क्योंकि बिहार का असली विकास तब माना जाएगा, जब विकास की तस्वीर केवल राजधानी की सड़कों पर नहीं, बल्कि सीमांचल के गांव, कोसी के खेत, दक्षिण बिहार के कस्बे और हर गरीब परिवार के घर में दिखाई दे।
स्रोत
• NITI Aayog — National Multidimensional Poverty Index 2023
• NITI Aayog — Multidimensional Poverty in India since 2005-06
• UNDP India — National Multidimensional Poverty Index Progress Review
• Bihar Budget Analysis 2026-27, PRS Legislative Research
